“न जाने क्यों कश्तिया डूब जाती हे साहिल पे आ कर,
न जाने क्यों साख छुट जाती हे पतजद को पा कर,
सोचता हूँ शुक्रियादा कर लू उन गुज़रे लम्हों का,
शायद “सिफर” ज़िन्दगी फिर कही धोका न दे जाये”
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यूँ ज़ाया नहीं करते निगाहों के नूर किसी कमज़र्फ़ इल्म पर,
बाकी समंदर कोभी देर नहीं लगती “सिफर” बनने में.
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तकरार छोड़ तक़रीर भी किया कीजिये, प्यार की स्याही से तकदीर को लीखा लीजिये,
ज़ख्म हो तो इंतज़ार-ऐ-मरहम लगा लो, “सिफर” मरासिम को इत्तेफाक न बना लीजिये.
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न जाने केसे आवाज़ पैदा हूई इस बंज़र से दिल में,
यह तो “सिफर” ज़बान हे जो बयां करने से कतराती है.
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